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गुलाम तो हम आज भी है – Guest Post by Iti Raj Sharma

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गुलाम तो हम आज भी है ,बस फ़र्क़ इतना ज़रूर है कि पहले ज़बरदस्ती थे आज अपनी मर्ज़ी से है। अब ऐसा लग रहा कि फिरंगियों से आज़ादी लेना मतलब हमने कहा कि आपने बहुत नुकसान पोहचाय है भारतीय संस्कृति और सभ्यता को जड़े हिला के रख दी अब थक गए होंगे न? एक काम करो आप ब्रिटैन निकल लो बाकी की रही सही कसर हम पूरी कर लेंगे ।

Some old Pictures of Slavery

न जाने कितनी सांसे इसलिए थम गई थी ताकि हम लोग आज़ाद भारत मे सांस ले सके। पर क्या होना था और क्या हो गया, आज़ादी का मतलब इस सदी में है डिस्को जाना, अपनी पसंद के कपड़े पहनना,रात भर बाहर रहना, कोई रोक टोक न होना, क्या सच मे यही आज़ादी है? चरण स्पर्श में शर्म महसूस करना? संस्कृति का त्योहारो तक सिमट के रह जाना? क्या यही आज़ादी है।

वैसे गलती हमारी भी नही है क्योंकि अंग्रेज़ो ने भारतीयों की मानसिकता में कूट कूट के यह भर दिया  कि भारतीय होना जाहिल है, नीचता है और पच्छिमी संस्कृति बहुत ऊंची है समाननिये है और गरिमापूर्ण है, अंग्रेज़ चले गए पर यह सोच घर कर गयी भारतीय जनता में, और हम खुद को बताते है आज़ाद ,स्वतन्त्र क्या सच मे अपनी असलियत छोड़ कर ग़ैर के पीछे पगला जाना आज़ादी है? हम सोचे भी क्यों ?बदले भी क्यों जब यह सब आसान है सुकून भरा है।

अपनी संस्कृति को बोझ समझना आम हो गया है क्योंकि आदत हो गयी है दूसरी जगह मुह मारने की यह शब्द बेशक सुनने में कटु प्रतीत हो रहे हो पर करने में यह सब आनंद देई है तभी तो ध्यान नही जाता कि कहाँ जाना था कहाँ निकल लिए । आयुर्वेद घास फूस हो गया है हिंदी बोलना मतलब निचले स्तर के होना और भजन जो गलती से गा दिया तो हसी के पात्र बन जाओगे क्योंकि यह बुढ़ापे के काम है अभी तो ऐश करो ज़िन्दगी जिओ , गलती हमारी यही है कि हम खुद अपनाना नही चाहते अपनी संस्कृति को न जाने क्यों बोझ हो गयी है यह जबकि इसी भारत से इस संस्कृति में पल बढ़ कर कई महान लोगो ने ख्याति प्राप्त की है शायद गिनती कम पड़ जाए ।

रही बात कुरीति की तो है कुरीतिया भारत मे बहुत पर क्या चंद कंकर आ जाने से क्या पूरा अनाज फेंक दे  अगर हम सुधार की बजाय धिक्कार को चुनते है तो दोष किसका हुआ? क्या “वेस्टर्न कल्चर” दूध का धुला है? हज़ारो बीमारिया ऐसी है आज भारत मे  जिनका इतिहास में ज़िक्र तक नही है क्योंकि उनकी जड़े यहाँ की है ही नहीं और यहाँ तक आने का कारण है अपनी असलियत छोड़ कर परतंत्र हो जाना हमारा वातावरण कुछ और है अब जबरदस्ती अब कुछ और थोपेंगे खुद पर तो फिर विस्तार का पता नही विनाश लाज़मी है, कोई अपनी संस्कृति के साथ चलना चाहे तो मज़ाक बन ने के डर से पीछे हट जाता है मोर्डन होने क्या पर्यायवाची अपने संस्कार भूलना तो किसी भाषा शायद ही हो।

गुलाम
Old Pictures of Slavery

बेशक हमे कुछ नया सीखना है पर सही गलत का फ़र्क़ उस से पहले सीखले तो बढ़िया होगा और यह नही है कि वैस्टर्न कल्चर अभाव पूर्ण या मैला है हा बहुत कुछ अच्छा है उसमें सोच का तरीका अलग है आकर्षक है आराम है उस लाइफस्टाइल में और कुछ मायनो में सोच का दायरा भी बड़ा है भी पर बात तब गड़बड़ाती है जब हम अंधे ही जाए और हर चीज़ को अपनाने लगे बिना उसकी कमी पहचाने और खुदकी संस्कृति का गला घोटे।
हर पीढ़ी का दायित्व है अपने अनुभव अपनी संस्कृति अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सोंपना हमे काफी कुछ नही मिल पाया है अब बारी हमारी कि कम से कम हम ऐसा अपनी पीढियो के साथ ना करे…

अपनी संस्कृति को नीच सोचने से पहले  इसपर हँसने से पचले एक बार उस आज़ाद हिंदुस्तान के सपने के बारे में ज़रूर सोचना जिसके लिए हमारे पुरखो ने सोचा और अपना बलिदान दिया और अब बारी हमारी है इसका विस्तार करें इसका सम्मान करें और अपनी अगली पीढ़ी को सोंपे।

Special Thanks to Iti Raj Sharma for giving her precious time to Infrolic.. Ravi Chaubey(Founder)

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